जेठ जी मुझे चोद कर मजा दिया (Jeth Ji Ne Mujhe Chod Kar Maja Diya)

मैं नींद में थी, तभी मुझे महसूस हुआ कि मेरे पति ने मेरे दोनों हाथों को पकड़ा हुआ है और अपने पैरों से मेरे पैरों को भी जकड़ रखा है. तभी मेरी आँखें खुलीं और एक डर के चलते मेरे बदन में करंट सा दौड़ गया. जेठ जी बेड पर बैठे हुए मेरे पूरे बदन पर हाथ फेर रहे थे और बड़बड़ा रहे रहे थे- नीतू रानी, तुम्हें जब पहली बार देखा था, तभी से तुम मुझे बहुत पसंद आ गई थीं. तुम्हें चोदने का, चखने का मेरा हमेशा से एक सपना रहा था. आज तेरा पति दूसरे शहर गया है.. इस मौके का मैं आज फायदा उठाऊंगा, आज मैं तुम्हें जबरदस्त चोदूंगा और तुम्हें मुझे सहन करना पड़ेगा.

मेरे सास ससुर के जल्दी गुजर जाने के बाद मेरे जेठ ने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर मिल में काम करने लगे थे. उन्होंने बहुत मेहनत करके मेरे पति को पढ़ाया, मेरे पति की पढ़ाई के लिए जेठ जी ने शादी तक नहीं की. मेरे पति उनकी बहुत इज्जत करते थे. अच्छी पढ़ाई की वजह से मेरे पति की अच्छी नौकरी लग गयी. मेरे पति ने हम जहां रह रहे थे, वहीं के पास की बिल्डिंग में फ्लैट खरीद लिया था और हम वहां पर रहने लगे थे. मेरे जेठ अभी भी उसी चॉल में ही रहते थे. मिल में काम करने की वजह से जेठ जी की तीनों शिफ्ट में जॉब रहती थी, इसलिए जब भी उनको समय मिलता, वह खाने के लिए यहीं हमारे फ्लैट में आ जाते थे.

मेरे पति ने शादी की पहली ही रात में मुझे उनके भाई के बारे में बता दिया था. उनको अपने बड़े भाई के त्याग का अहसास था, हमारी जितनी भी प्रगति हुई थी, जेठ जी के वजह से ही हुई थी. वो हमेशा जेठ जी का ख्याल रखते थे और उनकी यही इच्छा थी कि मैं भी उनका उतना ही ख्याल रखूँ.

मेरे मायके की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी, इसलिए अच्छा कमाने वाला पति मिलना, मैं अपना भाग्य समझती थी. इन सभी वजहों से भी मैं उनकी इच्छा का अनादर नहीं करना चाहती थी.

शादी के कुछ दिन तक तो सब ठीक था, जेठ जी हमारे घर खाना खाने आते, मेरे पति से बात करते और चले जाते, पर थोड़े ही दिनों बाद उन्होंने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.

मैं घर में साड़ी ही पहनती थी, गाउन पहनना मेरे पति को पसन्द नहीं था. घर के काम करते वक्त कभी कभी पल्लू अपनी जगह पर नहीं रहता था, कभी पेट खुला पड़ जाता, तो कभी ब्लाउज में से स्तन दिखने लगते थे. मेरे जेठ जी की नजर मेरे पर ही रहती थी. उनको इस बात का इन्तजार रहता था कि कब मेरा पल्लू सरके और मेरी जवानी का खजाना उन्हें देखने को मिले. पर अभी तक जेठ जी ने मुझे गंदे इरादों से छुआ नहीं था, पर आगे चल छुएंगे नहीं, इस बात की भी कोई गारंटी नहीं थी. मैं मेरे पति को भी नहीं बोल सकती थी, कहीं उनको ऐसा ना लगे कि मैं उन दोनों के बीच में गलतफहमी पैदा करने की कोशिश कर रही हूँ. उस स्थिति में तो मेरे पति मुझे घर से भी निकाल सकते थे.

आजकल दो तीन दिन से मेरे पति ऑफिस के काम से दूसरे शहर गए थे, तब से मैं डर डर कर ही रह रही थी. पर जिस बात का मुझे डर था, वही अभी मेरे साथ हो रहा था.

जेठ जी कह रहे थे- आज मैं तुम्हें जबरदस्त चोदूंगा और तुम्हें सब सहन करना पड़ेगा.
ये कहकर मेरे जेठ मेरे कपड़ों की तरफ बढ़े, उन्होंने मेरा पल्लू मेरे सीने से पहले ही अलग कर दिया था. अब वो मेरे गोरे सपाट पेट पर हाथ घुमा रहे थे. मेरे हाथ पैर बंधे होने के कारण न तो मैं विरोध कर सकती थी और ना ही मैं चिल्ला सकती थी. बस आँखों से उनसे मुझे छोड़ देने की विनती कर रही थी.

कुछ देर के बाद मेरे जेठ ने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा, कुछ देर मेरे ब्लाउज के ऊपर से मेरे मम्मे मसलने के बाद उन्होंने मेरे ब्लाउज के हुक खोलना शुरू कर दिए. दो तीन हुक खोलने के बाद उन्होंने ब्लाउज के हुक खोल कर सामने से उसे मेरे स्तनों के ऊपर से हटा दिया और मेरी ब्रा ऊपर कर दी. मेरे गोरे गोरे गोल गोल स्तन उनके सामने नंगे हो गए, पूरा खजाना उनके सामने खुल ही गया था. मेरे दोनों स्तनों को अच्छे से चूसने दबाने के बाद उनका हाथ फिर से मेरे पेट पर बंधी साड़ी पर गया.

मेरे पति दूसरे शहर गए थे, तो दो तीन दिन से मेरी भी चुदाई नहीं हुई थी और उनकी कामुक हरक़तों की वजह से मेरी कामवासना भी जागृत होने लगी थी.

जेठ जी ने मेरी साड़ी खींच खींच कर मेरी बदन से अलग की, फिर पेटीकोट का नाड़ा ढीला करके पेटीकोट भी सरकाकर नीचे कर दिया. अब मेरा एकमात्र वस्त्र मेरी पैंटी मेरी इज्जत ढके हुए थी. जेठ जी उठकर ड्रेसिंग टेबल के पास गए, वहां से एक कैंची उठाकर ले आए. फिर मेरे पास बैठकर मेरा पेटीकोट और मेरी पैंटी दोनों को काट कर मेरी शरीर से अलग कर दिए.

थोड़ी देर मेरे नंगे बदन को आंखें फाड़ कर देखने के बाद मेरे जेठ मेरे पैरों की ओर बढ़े, उन्होंने मेरे पैरों की उंगलियों को अपने मुँह में लेकर के चूसना शुरू कर दिया. अब तो मेरी चुत में गुदगुदी होने लगी. जेठ जी धीरे धीरे ऊपर सरकते हुए मेरे पैरों को सहलाने और चूमने लगे. इसके बाद वे मेरी जांघों तक पहुंच कर मेरी जांघों को चूमने सहलाने लगे. मेरे पूरे शरीर में कामुक लहरें दौड़ रही थीं, पर मुँह में कपड़ा होने के कारण मेरे मुँह से सिसकारियां नहीं निकल पा रही थीं.

अब उन्होंने अपने हाथ मेरे त्रिकोणीय क्षेत्र पे ले जाते हुए, मेरी चुत को छेड़ना शुरू कर दिया. उनकी उंगलियों के उस खुरदरे स्पर्श से मेरी चुत पानी छोड़ने लगी. जेठ जी अपनी एक उंगली मेरी चुत में डालकर अन्दर बाहर करने लगे, साथ में मेरी चुत के दाने को भी उंगलियों से छेड़ने लगे. जेठ जी अपनी उंगली को गोलाकार घुमाते हुए मेरी चुत के अन्दर बाहर करने लगे.

जेठ जी भी मेरा नंगा बदन देख कर गर्म हो गए थे, वह बेड पर खड़े हो गए और अब उन्होंने अपनी लुंगी खोल दी. मुझे चोदने के इरादे से आये हुए मेरे जेठ जी ने अन्दर अंडरगारमेंट्स भी नहीं पहने हुए थे. उनका लंड पूरा तनकर खड़ा था और जेठ जी बेशर्मों की तरह उसे हाथ में लेकर के हिला रहे थे.

जेठ- देख नीतू रानी, देख मेरा लंड … है ना तेरे पति से बड़ा? तुझे बहुत पसंद आएगा ये!
मैं आंखें बड़ी करके उनके लंड को देख रही थी, सच में उनका लंड मेरे पति से बड़ा और लंबा था. सच बोलूं तो उनका रसीला लंड देख कर मेरे मुँह में और मेरी चुत में पानी आने लगा था. इतना बड़ा लंड जेठ जी मेरी चुत के अन्दर डालकर मुझे जम कर चोदेंगे, इसी बात से ही मैं खुश हो रही थी, पर मैं ऊपर ऊपर से डर और नाराजगी जाहिर कर रही थी.

जेठ जी मेरी जांघों के ऊपर मुझे चोदने की पोजीशन में बैठ गए. वे अपने एक हाथ से मेरी चुत को चौड़ी करके उसमें अपना लौड़ा धीरे धीरे पेलने लगे. जैसे जैसे उनका लंड मेरी मुनिया में घुस रहा था, वैसे ही मेरी चुत खुलने लगी थी. उनका बड़ा लंड मेरी चुत के दीवारों से रगड़ खा रहा था. मेरे पूरे शरीर पर रोंगटे खड़े हो रहे थे.

धीरे धीरे करके जेठ जी ने अपना पूरा लंड मेरी चुत में पेल दिया और अब वे चूत में हल्के हल्के धक्के लगाने लगे. लंड ने चूत की चिकनाई से अपनी जगह बना ली तो मेरे जेठ जी ने धीरे धीरे अपनी स्पीड बढ़ा दी. उनके हर धक्के के साथ मेरे स्तन उछल कूद कर रहे थे. जेठ जी उन्हें बारी बारी चूस कर अपनी कमर से एक लय में धक्के दे रहे थे.

कुछ ही देर बाद मेरी वासना के ज्वालामुखी फट पड़ा और मैं ज़ोरों से छूट पड़ी. मेरी पानी का जोर इतना था कि उसकी वजह से उनका लंड चुत से सटक कर बाहर आ गया. जेठ जी ने फिर से अपने लंड को मेरी चुत के अन्दर डाल दिया और जोश से धक्के देने लगे. मेरी चुत की गर्मी में उनका टिक पाना भी मुश्किल लग रहा था. फिर एक जोर के धक्के के साथ उन्होंने अपना लंड जड़ तक अन्दर डाल दिया और झड़ने लगे.

तेज गर्म वीर्य की पिचकारियां मेरी चुत के अन्दर गिरने लगीं. मेरी चुत भी उस गर्मी को सहन नहीं कर सकी और फिर एक बार फूट फूट कर झड़ने लगी.

चुदाई के बाद थकान हो जाने की वजह से जेठ जी मेरे शरीर पर ही पड़े रहे. कुछ ही देर में उनका लंड सिकुड़ने की वजह से बनी हुई जगह से हम दोनों का कामरस बहकर नीचे चादर गीली कर रहा था.

कुछ देर बाद जेठ जी मेरे बदन पर से उठे. हम दोनों के कामरस में सना हुआ रोशनी में चमक रहा था. जेठ जी ने अपना कामरस से सना हुआ लंड मेरी फटी हुई पैंटी से साफ किया. अब वे मुझसे बोले- नीतू रानी, आज मेरी बहुत दिनों की इच्छा पूरी हो गई. माफ करना, तुम्हें थोड़ी तकलीफ दी, पर दूसरा कोई चारा नहीं था.

जेठ जी ने अपने कपड़े पहने, फिर मुझे देख कर मुस्कुराकर जाने लगे.
मैं चिल्लाई- वहीं रुक जाइये जेठ जी … मैं भी यह बात मैं आपके सामने कबूल करना चाहती हूं कि आपके इस जबरदस्त सेक्स में मुझे अलग ही मजा मिला. मेरे पति भी मुझे अच्छा चोदते हैं, पर आज जैसा मजा मुझे पहली बार मिला है. कल भी मेरे पति घर से बाहर रहेंगे, आप कल रात का खाना खाने घर आ जाना. कल मैं खुद अपनी मर्जी से आप को साथ दूँगी.

मेरी बातें सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, वह दौड़ कर मेरे पास आए और मुझे किस कर लिया. जेठ जी बोले- नीतू तुम्हारी बातें सुनकर मैं खुशी से पागल ना हो जाऊं. आज रात मेरी ड्यूटी है, नहीं तो तुम्हारी और एक बार चुदाई करता, पर कोई बात नहीं कल रात मैं छुट्टी ले लूंगा. कल पूरी रात तुम्हारी जम कर चुदाई करूँगा.
यह कहकर जेठ जी मुझे किस करके और मेरे मम्मे सहला कर चले गए. मैं भी चुदाई के नशे में सो गई.

दूसरे दिन मैं देर से उठी. पूरे दिन मैं खुश थी, आज रात मेरा जेठ मेरी मर्जी से मुझे उनके बड़े लंड से जम कर चोदेगा, इसी ख्याल से ही पूरे दिन मेरी चुत गीली होती रही.

घर के कामों में दिन गुजर गया और रात हो गयी, मैं बेड पर बैठे जेठ जी का इंतजार कर रही थी. उतने में जेठ जी आये और मेरे पास बैठ गए- नीतू, कल रात के लिए मुझे माफ़ कर दो.
मैं- जेठ जी, मैंने आपको तो कब का माफ कर दिया है, अब मुझे आपके मूसल लंड से मेरी चुत की कुटाई करवानी है, जल्दी से आ जाओ, अब मुझे मत तरसाओ.
जेठ- नीतू अभी नहीं, आज मैं तुम्हें अच्छे से और बड़े ही प्यार से चोदना चाहता हूं.. जिसमें हम दोनों को मजा आए.

उन्होंने पहले मेरे बालों पर हाथ फेरे, फिर मेरे सिर को अपने हाथों में पकड़ते हुए मेरे होंठों पर किस करने लगे. धीरे धीरे होंठों को चूमते हुए उन्होंने अपनी जीभ मेरे मुँह के अन्दर डाल दी. मैंने भी अपनी जीभ को हरकत में लाते हुए उनकी जीभ से खेलने लगी. हम दोनों पूरे जोश में एक दूसरे के जीभ और होंठों को चूस रहे थे. उन्होंने मेरे पल्लू को मेरे सीने पर से हटाया और मेरे ब्लाउज के हुक्स खोलने लगे. मेरा ब्लाउज हाथों से पूरा उतारकर उन्होंने मेरी ब्रा भी उतार दी.

जेठ जी बड़े ही उतावले हो गए थे, मुझसे फोरप्ले करने की बजाए, वह मुझे जल्द से जल्द नंगी करने पर तुले थे. मैं भी उनका पूरा साथ दे रही थी. जेठ जी को शायद मेरे गोल गोल गोरे स्तन बहुत पसंद आ गए थे, वह बारी बारी मेरे स्तनों को चूस रहे थे और सहला रहे थे. उनके मर्दाना हाथों से हो रही मेरे स्तनों की मालिश की वजह से मेरी चुत पूरी गीली हो गई थी.

मैं सिसकारियां लेते हुए बोली- आहहह … जेठजी बहुत अच्छे और जोर से मसलो, बहुत अच्छा लग रहा है!
अब वो और भी जोश में मेरे स्तनों को मसलने और चूसने लगे. इससे मेरी चुत में खलबली मची हुई थी, मैं अपनी जांघों को एक दूसरे पर रगड़ रही थी.

धीरे धीरे जेठजी नीचे की ओर बढ़े, मेरी नाभि पर किस करते हुए अपनी जीभ को नाभि पर गोल गोल घुमाने लगे. जेठ जी ने अपना एक हाथ नीचे ले जाते हुए मेरी साड़ी खोल दी, फिर पेटीकोट की गांठ खोलते हुए साड़ी और पेटीकोट एक साथ ही नीचे सरका दिया.

जेठ- नीतू, तुम भी बहुत गर्म हो गयी हो, अपनी पैंटी का हाल तो देखो.
मैंने अपना हाथ मेरी पैंटी के ऊपर रखा, तो वह पूरी गीली हो गई थी, जैसे कि मैंने पेशाब कर दी हो. मैंने जेठ जी की तरफ देखा, तो वह मेरी उस अवस्था पर मुस्कुरा रहे थे, मुझे बहुत शर्म महसूस हो रही थी.

जेठ- गीली पैंटी की वजह से तुम्हारी चुत को सर्दी हो जाएगी.
मैं- जेठ जी, उसे पहले ही सर्दी हो गयी है, उसी वजह से वह बह रही है, इससे पहले की सर्दी और बढ़े, आप मेरी पैंटी उतार दो.

मैंने उन्हें अपनी पैंटी उतारने के लिए आमंत्रित किया. उनको भी यही चाहिए था, उन्होंने एक ही झटके में मेरी पैंटी उतार दी. हल्के भूरे बालों में छिपी मेरी गुलाबी चुत उनके सामने आ गयी. मेरी मुनिया को देख कर वो पागल हो गए. वैसे तो उन्होंने कल रात को उसकी चुदाई की थी, पर वो आज उसे अच्छे से देख पा रहे थे.

जेठ जी ने मेरी चुत को सहलाना शुरू कर दिया. मुझे भी उनका मेरी चुत पर हक जताना बहुत अच्छा लगा. इतने दिन मैं उनका तिरस्कार कर रही थी, इतने दिन मैं उनके बड़े मूसल का फायदा नहीं उठा सकी, इसलिए मैं खुद को कोस रही थी.

जेठ- नीतू मुझे तुम्हारी मुनिया को चाटना है, उसके बाद ही मैं तुम्हें चोदूंगा.
मैं- जेठ जी, आज से मैं आपकी भोग्या पत्नी हूँ, आपको जो करना है, वो करो और वैसे मुझे भी आपका लॉलीपॉप अच्छे से देखना है और चूसना है.

जेठ जी ने अपनी अपनी लुंगी उतारी, कल की तरह आज भी उन्होंने अन्दर कुछ नहीं पहना था. किसी गुस्सैल नाग की तरह उनका लंड फन निकाले डोल रहा था. जेठ जी नीचे लेट गए और उन्होंने मुझे उनके मुँह पर बैठने को बोला. मैं उनके पैरों की तरफ मुँह करके उनके मुँह पर बैठ गयी और उनके सीने पर लेट गई. उन्होंने मेरी चुत के होंठों को अपनी उंगलियों से अलग किया और मेरी चुत में जीभ घुसा दी. जेठ जी मेरी चुत के हर कोने को चूस रहे थे. मेरी चुत अब और भी ज्यादा पानी छोड़ने लगी थी.

जेठ- नीतू, तुम्हारी चुत सच में बहुत स्वादिष्ट है, बहुत मीठा पानी है तेरी चुत का.
उन्होंने एक उंगली मेरी चुत में डाल दी. उंगली से मेरी चूत को कुरेदते हुए जेठ जी बोले- नीतू रानी, तेरी चूत बहुत टाइट भी है. क्या तुम्हारा पति तुम्हें चोदता नहीं है?

मैं- जेठ जी, जाने दो ना उसे, वो नहीं चोदता तो क्या हुआ. आप तो हो ना, आज से मेरा दूसरा पति मुझे रोज चोदेगा.

उधर जेठ जी का नाग मेरे सामने फन निकाल कर डोल रहा था, मैंने झट से उसे पकड़ा और उसे मुँह में डाल लिया. मैं जेठ जी के लंड को लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी. उनके प्रीकम का स्वाद बहुत मीठा था. मेरे पति चुसाई के मामले में बहुत शर्मीले हैं. ना वो मेरी चुत चूसते हैं और ना ही मुझे अपना लंड चूसने देते हैं. पर इस मामले में मेरे जेठ जी बहुत ही उत्सुक दिखे.

मैं भी बड़े जोश में जेठ जी के लंड को चूसने लगी. बहुत देर तक हमारा यह चुसाई का खेल चल रहा था. उनकी चुत चुसाई से मेरी कामवासना भड़क रही थी और वह सिर्फ चुसाई से शांत नहीं होने वाली थी. मुझे अब उनका मूसल मेरी मुनिया में चाहिए था.

मैंने जेठ जी के लंड को अपने मुँह से बाहर निकाला और उनसे बोली- बस बहुत हो गयी चुसाई … जेठ जी, अब सहन नहीं होता … अब डाल भी दो आप अपना लंड मेरी चुत में.
उनको भी वही चाहिए था, उन्होंने मुझे पलट कर नीचे लिटाया और मेरी जांघों के बीच में आ गए. उन्होंने मेरी टांगें ऊपर उठाईं और मेरी चुत पर अपना लंड घिसने लगे.
मैं चुदासी सी बोल उठी- जेठ जी … यार अब मत तड़पाओ, मेरी चुत कब से आप के लंड के लिए तरस रही है.

मैं बोल ही रही थी कि जेठ जी ने एक ही झटके में अपना पूरा लंड मेरी चुत में पेल दिया. मेरी चुत पूरी चिपचिपी होने के कारण उनके लंड को कोई विरोध नहीं हुआ. मेरे मुँह से एकदम से आह निकल गई- आह मर गई!

जेठ जी ने हंसते हुए धीरे धीरे धक्के देने शुरू कर दिए. वे मेरी चुत में गोल गोल लंड घुमाते हुए मेरी चुत में धक्के देने लगे. उनके हर वार से मैं पूरी तरह से हिल जाती. उनके हर धक्के के साथ कामुक लहरें चुत से होकर पूरे बदन में फैल जाती थीं. ऐसी चुदाई हो रही थी, जिससे लग रहा था कि ये ऐसे ही चलती रहे, कभी खत्म ही ना हो.

मैं भी नीचे से कमर हिलाते हुए उनके हर धक्के का उत्तर देने लगी. जेठ जी लगातार मुझे चोदे जा रहे थे. इसी दौरान मैं एक बार झड़ भी चुकी थी, पर मुझे पूरी संतुष्टि नहीं मिली थी. फिर आखिरकर वह पल आ ही गया, मैं और जेठ जी एक साथ ही झड़ गए. हम दोनों ने एक दूसरे की बांहों में कुछ देर आराम किया. उस रात हम दोनों ने न जाने कितने प्रकार से कामसुख लिया.

एक बार मैंने जेठ जी के ऊपर बैठ कर उन्हें जम कर चोदा, तो जेठ जी ने भी खड़े खड़े मुझे दीवार से सटाकर चोद डाला. उस वक्त मैंने अपनी टांगों से जेठ जी की कमर पकड़ी हुई थी. भले ही पहले जेठ जी ने मेरे साथ थोड़ी जबरदस्ती की हो, पर उनकी चुदाई मुझे इतनी पसंद आ गयी कि पति के आने तक मैं उनके नीचे ही लेटी रही.

हालांकि मैं अपने पति को भी पूरा खुश रखती हूँ, पर जब भी मुझे मौका मिलता, मैं जेठ जी को बुला कर उनसे चुत की शांति करवा लेती. आखिरकार मेरे पति ने ही तो मुझे कहा था कि जेठ जी का ख्याल रखना है.

मेरी मदमस्त चुदाई की कहानी आपको कैसी लगी, प्लीज़ मुझे मेल करके जरूर बता दें. मेरा मेल आईडी है nitu.patil4321@gmail.com

मामी की गांड चुदाकर सुहागरात मनाई

के दूसरे भाग से आगे का भाग है.

सुबह के पांच बज गए थे, रात का अँधेरा छंटने लगा था. जब मेरी नींद खुली, तो देखा कि मामी जी उसी तरह नंगी मेरी बगल में सो रही थीं. उनके मुख पर असीम तृप्ति का आभास हो रहा था. उनके नंगे बदन को देख कर रात की घटना अब मेरे दिमाग में आने लगी थी और मेरा ध्यान मामी जी की चिकनी चमकती हुई गुलाबी चूत पर केंद्रित हो गया. उनकी चूत ऐसी लग रही थी, जैसे एक छोटा करेला किसी ने छील कर बीच में से चीर दिया हो. चूत के होंठ सूजकर एकदम फूली हुई पॉव रोटी जैसे हो गए थे … बिल्कुल लाल गुलाबी.

तभी मामी जी ने मेरी ओर करवट ली और उनके बड़े बड़े स्तन मेरे हाथों से टकराने लगे. मैं अपना हाथ सीधा किया और हल्के हाथ से मामी जी के स्तनों को दबाने लगा. इतने मक्खन से मुलायम उनके स्तनों को थोड़ी देर दबाने के बाद मैंने अपना बांया हाथ उनकी मख़मली चूत पे रख दिया. चूत पर हाथ के स्पर्श से मामी जी की आंख खुल गई और उन्होंने मेरी तरफ देखा.
हम एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिए.

मैंने उनकी चुत को सहलाते हुए कहा- गुड मॉर्निंग जानू..
मामी जी भी बोलीं- गुड मॉर्निंग मेरे सैंया.

तभी उनकी नजर मेरे लंड पर गई, मेरा लंड फिर से खड़ा हो चुका था. यह देख कर मामी मुस्कुरा दीं और लंड को अपने हाथ में लेकर हल्के हाथों से हिलाने लगीं.
मामी जी- क्या ये अभी भी भूखा है? सारी रात तो मुझे चोदता रहा और अब फिर से अकड़ गया.
मैं- अब ऐसी प्यारी चूत और गांड मिले, तो ये रात दिन खड़ा ही रहेगा मामी जी.
मामी जी- राहुल, आपकी चुदाई और आपका लंड तो इतना मस्त शानदार है कि जी चाहता है कि आप मुझे चोदते जाओ और मैं आपसे चुदवाती रहूँ.
मैं- मामी जी, मेरी भावनाएं भी कुछ ऐसी ही हैं. मुझे आपकी गांड मारने में बहुत मज़ा आया. ऐसा मज़ा आज तक मुझे कभी नहीं मिला था.

यह सुनकर मामी जी मुस्कराने लगीं. मामी जी ने मुस्कुराते हुए अपनी चूत की तरफ इशारा किया और कहा- देखो तो इस मूसल ने मेरी कोमल सी चूत का क्या हाल बना दिया है?

सच में दोस्तों मामी जी की चुत एकदम फूली हुई नजर आ रही थी. मामी जी ने थोड़ी करवट ली और अपनी चुदी हुई गांड को देखने लगीं और बोली- राहुल, देखिए क्या हालत कर दी आपने मेरी गांड की, कितनी छोटे से छेद वाली गांड थी.
मैं मामी की गांड देखने लगा.

मामी अपनी गांड के छेद को छूते हुए कहने लगीं- गांड का छेद कितना बड़ा हो गया है. मेरी तीन उंगलियां भी एक साथ अन्दर चली जा रही हैं.
मैंने देखा मामी जी की गांड का छेद पहले से वाकयी बहुत बड़ा हो गया था. मैंने उन्हें होंठों पर एक किस किया और कहा- बधाई हो मामी जी, आखिर आपकी गांड का उद्घाटन हो ही गया.
मामी जी- आपको भी बधाई हो राहुल … आखिर आपकी ही तो मेहनत का फल है. आपकी भी सुहागरात आज पूरी हुई है.

हम दोनों एक दूसरे को चूमने लगे.

मामी- राहुल मेरे शरीर में हल्की सी थकान महसूस हो रही है और गांड में भी दर्द हो रहा है.
मैं- ह्म्म्म मेरे पास इसका इलाज है, चलो मामी जी बाथरूम में हल्का सा शावर लेते हैं, वहां आपका दर्द में भगा दूँगा.

वो गांड में दर्द के मारे उठ नहीं पा रही थीं, तो मैंने उन्हें अपनी गोदी में उठाया और नीचे उतर कर दरवाजा बंद करके बाथरूम में ले गया. बाथरूम में हैंड शावर से हम दोनों ने अच्छे से एक दूसरे को नहलाया. मामी जी को अब काफी अच्छा लग रहा था.

मुझे एक बार और मामी जी की गांड मारनी थी. मैंने सोचा क्यों ना शावर में चुदाई हो जाए. यह सोच कर मैंने हैंड शावर चालू कर दिया. जैसे ही शावर का ठंडा पानी मामी जी के ऊपर पड़ा, उनकी जोर से सिसकारी निकल गई और वे मुझसे कसके लिपट गईं. पानी हल्का सा ठंडा और सेक्सी सा कम्पन दे रहा था.
मैंने भी मामी को बांहों में भर लिया. कुछ देर में हम दोनों का पूरा बदन भीग गया और हम दोनों फ़िर से गर्म हो गए. मैं उनके गाल, माथे, और गले पर चुम्बन करने लगा और दोनों हाथों से धीरे धीरे से उनकी पीठ को मैं सहलाता जा रहा था.

मैं- मामी जी क्यों ना मॉर्निंग वाली चुदाई हो जाए.
मामी जी- राहुल, आपके लंड के लिए मैं हमेशा तैयार रहती हूं.

यह सुनकर मैंने मामी जी को शावर की दीवार के साथ सटा कर खड़ा किया और उनके होंठों को अपने होंठों में भर लिया. साथ ही मामी जी के बड़े बड़े मुलायम स्तनों को मसलते हुए, उनके होंठों का मैं रसपान करने लगा. मामी जी के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गयी और कामुकता के कारण वो भी मेरे होंठों को जोर से चूसने लगीं और मेरे मुँह के अन्दर अपनी जीभ डालने लगीं. हम दोनों पागलों की तरह एक दूसरे के होंठों को चूस रहे थे.

मामी जी के रसीले होंठ चूसने के बाद मैं उनके बड़े बड़े मुलायम स्तनों की तरफ बढ़ा. मैंने प्यार से उनके एक स्तन को अपने मुँह में लिया और जीभ फिरा फिरा कर चूसने लगा. कभी एक तो कभी दूसरा, मैंने लगातार मामी के दोनों मम्मों के निप्पलों को बारी बारी से चूस रहा था और उन्हें हल्के से बाइट भी कर रहा था.

जब मैं उन्हें बाइट करता, तो मामी जी जोर से ‘आहह … धीरे..’ की आवाज़ निकाल देतीं.

अब मैं मामी जी के स्तनों को चूमते हुए उनकी नाभि की तरफ बढ़ रहा था. फिर मैं नीचे घुटनों के बल बैठ गया और मामी जी के पेट पर प्यार से हाथ घुमाने लगा. फिर मैं उनकी नाभि में जीभ फिराते हुए नीचे की तरफ बढ़ने लगा. मैं जैसे ही नीचे जांघों के पास पहुंचा, मामी जी ने दीवार के सहारे खड़े खड़े ही अपने पैर खोल दिए. जिससे उनकी भरी हुई चूत पूरी तरह से मेरे सामने आ गई.

मामी जी एक टांग को उठा कर मैंने अपने कंधे के ऊपर रखा, इससे मामी जी की चुत की दोनों फांकें खुल गईं. मैंने अपने होंठों को उनकी चूत पर लगाया और चूत चूसने लगा. मै जैसे ही अपनी जीभ से उनकी चूत के दाने को सहलाने लगा, उनके अन्दर की औरत की वासना का सैलाब निकल पड़ा- अह्ह्ह्ह अहह्स्स राहुल … अह्ह्हह अह्ह्ह आह्ह्ह मजा आ रहा है … अह्ह्ह्ह अह्ह्ह.

मेरे सिर को अपनी चूत पर कस के दबा कर मामी सिसकारियां लेने लगीं, उनकी मादक सिसकारियां सुनकर मेरा जोश और बढ़ने लगा. मैं उनकी चूत को और जोर से चाटने लगा. थोड़ी देर बाद उनका पूरा बदन अकड़ने लगा और उन्होंने फिर से मेरे सिर को अपने चूत पर और कस के दबा लिया, वो झड़ गईं. मैंने उनका सारा कामरस चाट लिया और उनकी चूत को चाटकर साफ़ कर दिया.

उसके बाद मैं उठ कर खड़ा हुआ और मैंने मामी जी को पलट कर दीवार पर सटा दिया और उनको पीछे से अपनी बांहों में भर कर अपने होंठों को उनकी नंगी पीठ पर टिका दिया. मामी की नंगी पीठ को चूमते हुए मैं फिर से घुटनों के बल नीचे बैठ गया. अब मामी जी की मस्त मोटी गांड मेरे सामने थी, जिसका मैंने कल रात को उद्धाटन किया था.

ठंडे पानी की फ़ुहार मामी जी की गोरी कमर से फ़िसलते हुए चूतड़ों से जांघों पर बह रही थी. बड़ा ही कामुक दृश्य था. मैं मामी के दोनों मांसल चूतड़ों को अपनी मुट्ठी में ले कर मसलते हुए चूमते हुए चाटने लगा. मामी जी का उत्तेजित बदन एक बार और सिहर उठा. बिना कुछ बोले ही उन्होंने अपनी टांगें और फैला दीं.

फिर मैंने मामी जी के चूतड़ अपने दोनों हाथों से पकड़कर फैलाए, जिससे उनकी गांड का छेद दिखने लगा. मैंने गांड के छेद के ठीक पास में दोनों तरफ अपने दोनों अंगूठे लगाए और छेद को चौड़ा कर जीभ नुकीली कर अन्दर घुसा दी.
मामी जी की सिसकारी निकल गई- अह्ह्ह्ह ओह राहुल … तुम मुझे मार ही दोगे.

मैं जीभ अन्दर बाहर करके जीभ से ही उनकी गांड छेद को चोदने लगा. मामी जी भी जोर-जोर से सीत्कारते हुए मेरी जीभ के मज़े ले रही थीं. इधर मेरा लंड भी अब ऐसा तन गया था कि उसमें तकलीफ़ होने लगी थी.

मुझसे अब सब्र नहीं हो सकता था. मैं खड़ा हो गया और उनको पीछे से पकड़ कर उनकी पीठ पर एक चुम्बन जड़ दिया. मेरा तना हुआ लंड मामी जी की गांड की दरार में रगड़ खा रहा था. मामी जी भी पीछे की ओर अपनी गांड मेरे लंड पर दबा कर अपने चूतड़ों की दरार में लंड महसूस करके मस्त हो रही थीं.

मैंने अपने लंड को पकड़ कर अपने घुटनों को थोड़ा सा मोड़ लिया और मामी जी के चूतड़ों को फैलाकर अपने लंड के सुपारे को उनकी गांड के छेद पर टिका दिया. मामी जी ने भी मस्ती में आकर अपनी जांघों को थोड़ा सा खोल कर दीवार पर अपनी हथेलियों को जमा दिया. इसके बाद मामी ने पीछे से अपनी गांड को थोड़ा सा बाहर निकाल लिया … जिससे मेरा लंड का सुपारा उनकी गांड के छेद में घुस गया.

‘सीईईई …’ सिसकते हुए मामी जी ने अपने पैर और पसार दिए.
मैंने मामी जी की कमर को दोनों तरफ से पकड़ कर एक जोरदार धक्का मारा. मेरा आधा लंड मामी जी की गांड को फाड़ता हुआ अन्दर चला गया.
मामी जी के मुँह से एक हल्की चीख निकल गई- ह्ह्ह उम्म्ह… अहह… हय… याह… सीईई ईईईई अहह..

उन्होंने अपने होंठों को दाँतों में भींच लिए. अब मैंने अपने हाथ आगे करके पीछे से मामी जी के दोनों स्तनों को कस के पकड़ लिया और फिर से एक जोरदार धक्का दे मारा. इस बार मेरा आधे से ज्यादा लंड मामी जी की गांड को चीरता हुआ अन्दर जा घुसा.

मामी जी- आहह … उईईईई, मज़ा आ गया … और जोर से डालो … अपना लंड. … मेरी गांड में … अह्ह्ह फाड़ डालो … ऊऊहह … आआहह … अन्दर … और अन्दर आज्ज्जाआ … आअहह … मेरी गांड.
मैंने अपनी पोजीशन बनाते हुए कहा- मेरी प्यारी मामी … आह. … मेरी जान … आहह ले ना मेरी रानी.. … उम्म्म्मम आहहहाहा..
इस बार मैंने सुपारे तक धीरे धीरे लंड को बाहर निकाला और मामी जी के दोनों स्तनों को कसके पकड़ के फिर से एक जोरदार धक्का देकर एक बार में ही पूरा अन्दर तक पेल दिया.

मामी जी- अहहह … अय्य्यीईई … मरर गयी … धीरे धीरे से … अह्ह्ह … ऊऊऊ … ईईई ऊऊ. … धीरे सेसीईई … मेरे राजा.
मैं- ओऊऊऊ क्या हुआ मेरी जानू… अभी तो बोल रही थी ज़ोर से … और अभी चिल्ला रही हो … मेरी रानी मामी.
मामी जी- राहुल आपका लंड. … सीईई हिह … इतना मोटा और लंबा है, बिल्कुल घोड़े जैसा है … ऊफ्फफऊ भूल गई थी … रात को तेल के कारण तकलीफ़ नहीं हुई.

मैं धीरे धीरे से अपने लंड को अन्दर बाहर करते हुए कहने लगा- तो क्या हुआ पहली बार थोड़ी ही ले रही हो मेरी जान … कल रात से ही तीसरी बार गांड में घुसवा रही हो मामी जी … ह्हम्म फिर भी आपकी गांड थोड़ी अभी भी कसी हुई ही लग रही है.
मामी जी- आह मेरे लंडधारी पतिईईई … सीईईई … ओ मेरे राजज्जा कल रात को ही तो आपने मेरी कुंवारी गांड की सील अपने विशालकाय लंड से तोड़ी है.
मैं- ह्हम्म क्या मस्त गांड है आपकी … ऊऊऊ कल रात की चुदाई कैसे भूल सकता हूँ. … रात को तो बहुत मजा आया अहहहहाआ…
मामी जी- जानू धीरे से उईईई … अभी भी आपके लंड से मेरी गांड की दोस्ती थोड़ी कम ही हुई है.
मैं- तो आज दोस्ती पक्की हो चुकी समझो मेरी जान.
मामी- हम्म..

मैंने अपने धक्कों को स्पीड़ थोड़ा बढ़ाते हुए कहा- अभी भी गांड क्या कसी हुई ईईई है … मेरे रानी!
मेरी बातें सुनकर मामी जी ने अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया और अपने एक हाथ से मेरे सिर को पकड़ कर अपने चेहरे के पास ले आईं. उन्होंने मेरे कान पर चुम्मा दिया और यह करते वक़्त वो धीरे धीरे पीछे होके और अपनी कमर हिला कर, मेरे लंड को अपनी गांड के अन्दर बाहर करने की कोशिश कर रही थीं.

इसके साथ ही मामी मेरे कान में फुसफुसा कर बोलीं- अहहहह … हम्म्म्म ऐसे ही मेरी जानू उहूहूहू धीरे धीरे … सब्र करो ऐसे दो तीन बार गांड चुदाई होने के बाद मेरी गांड की आपके लंड से दोस्ती हो जाएगी … फिर आराम से अन्दर बाहर होने लगेगा.
मैं अपने लंड को धीरे धीरे मामी जी की गांड में धक्के देकर अन्दर बाहर करते हुए बोला- फिक्र मत करो मामी जी, आज तो आपकी गांड से दोस्ती हो गई समझो … ओह … सीईई…

अब मैं लंड को उनकी गांड में थोड़ा जोर से अन्दर बाहर कर रहा था. मैं अपने लंड को बाहर खींचता और जब सिर्फ़ सुपारा अन्दर रहता, तो एक ही धक्के में अपना लंड उनकी गांड में पेल देता.
मामी जी भी अपनी कमर को पीछे की और धकेल कर मज़ा ले रही थीं. इसी बीच मेरे अण्डकोष मामी जी की गांड पर लगते और थप थप की आवाज़ आती.

मुझे भी जोश आता जा रहा था, इस समय मामी जी की गर्दन को पकड़ कर उनके चेहरे को अपनी तरफ घुमाया और उनके गुलाबी रसीले होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसना चालू कर दिया. मामी जी भी कामुक सिस्कारियां लेते हुए मेरे होंठों को चूसने लगीं.

इधर शावर का ठंडा पानी हम दोनों पर गिर रहा था. लेकिन फिर भी हम दोनों के बदन बहुत गर्म महसूस हो रहे थे. शावर से गिरता पानी मामी जी के स्तनों से होता हुआ चूतड़ों तक ओर फिर नीचे चुदाई के साथ लंड से होता हुआ गांड के अन्दर बाहर निकल रहा था, जिससे पच पच पच की आवाजें बाथरूम में गूंज रही थीं.

मैं मामी जी के होंठों को चूसते हुए, नीचे जोर जोर से अपने लंड को उनकी की गांड के अन्दर बाहर कर रहा था. मेरे लंड की रगड़ को अपनी गांड के अन्दर महसूस करके, मामी जी भी अब पूरी मदहोश हो चुकी थीं. मामी ने अब पूरे जोश में आते हुए तेज़ी से अपनी गांड को आगे पीछे करना शुरू कर दिया.

मामी जी मेरे के होंठों से अपने होंठ अलग करती हुई सीत्कारने लगीं- सीईईई … बहुत अच्छा लग रहा है … सीईईईई … हाय राजा … मारो धक्का … जोर जोर से चोदो अपनी मामी की गांड को … … हाय मेरे सैयां … हाय मेरी चुत भी पानी छोड़ने लगी है.
मैं पूरा जोर लगा कर धक्का मारते हुए चिल्लाया- हाय सीईईई … क्या कसी है मामी तुम्हारी गांड … मजा आ गया …
मामी जी- अह्ह्ह फाड़ डालो. … आज इसे … अपने मोटे लंड से. … अह्ह्ह्ह्ह्ह. … सच में बहुत मजा आ रहा है … हां…ऐसे ही … ओह्ह्ह सैयां जी … मैं आज से आपकी पत्नी बन गयी.
मैं- हां मेरे रानी अब तो ये पति तुम्हारी दिल से सेवा करेगा.
मामी जी- अह्ह्ह्ह … ऐसे ही मन लगा कर बीबी की सेवा करना … हाय … सीईईईई … उफ्फ्फ … मेरे राज्जाअ … राहुल … और तेज़ … अओउरर्रर तेज. … सीईई …

मैं मामी जी के स्तनों को मसलते हुए उन्हें कस-कसकर चोद रहा था, जिससे बाथरूम में जोर जोर से पच पच पच की आवाजें हो रही थीं. मामी जी भी जोर जोर से सिस्कारियां लेते हुए उतनी तेजी से गांड आगे पीछे करके मेरा पूरा साथ दे रही थीं. पूरे बाथरूम में चुदाई का मधुर संगीत गूंजने लगा था.

मामी जी और मैं वासना के सागर में इस कदर डूबे हुए थे कि हम को अंदाज़ा तक भी नहीं था कि शावर का पानी बंद हो गया था. अब हम दोनों भी अपनी चरम सीमा तक पहुंच चुके थे. आखिर में मैंने एक बहुत ही ज़ोरदार झटका मारा, तो मामी जी के मुँह से फिर से चीख निकल गई- अहहहहाआ … मररर्रर गईई.

तभी मेरे लंड से गर्म गर्म वीर्य की मोटी मोटी पिचकारियां निकलने लगीं. इतना अधिक माल निकला कि मामी जी की पूरी गांड भर गयी. लेकिन मैं मामी जी की गांड में अभी भी दीवानों की तरह अपने लंड को अन्दर बाहर कर रहा था. मेरे लंड से वीर्य की पिचकारियां मामी जी की गांड में निकल कर गिरने लगी थीं. अपनी गांड में वीर्य की गर्माहट महसूस करती मामी जी एक बार फिर जोर से चीखते हुए झड़ने लगीं- औअहह हहहहहहा … मैं भी गयी … अहम्म्म्म ममम.

इस चीख से पूरा बाथरूम फिर शांत हो गया. हम दोनों पूरी तरह से हांफ रहे थे. मैंने पूरा शांत हो कर मामी जी के कंधे पर अपना सर टिका कर उनको कस के पकड़ लिया. जब हम दोनों की साँसें दुरुस्त हुईं, तो अपना लंड मामी जी की गांड से धीरे धीरे बाहर निकाल लिया. जैसे ही मेरा लंड मामी जी की गांड से बाहर आया … तो मामी जी सीधी हुईं और उन्होंने घूम कर मुझे चूम लिया. उनके सीधे खड़े होते ही, उनकी गांड से वीर्य की धार बह कर बाहर निकलते हुए, उनकी जांघों से होते हुए नीचे फर्श पर गिरने लगी थी.

हमें बहुत देर हो गई थी. लगभग सवा घण्टे से हमारी कामलीला चल रही थी. हम कुछ देर बाद अलग हुए और बाथरूम से निकल कर अपने बेडरूम में चले गए. मैंने और मामी जी ने अपने आपको टॉवल से साफ़ किया. फिर हम कपड़े पहनने की सोच ही रहे थे कि तभी याद आया कि हमारे कपड़े तो ऊपर छत पर ही हैं.

मैंने अपने कपड़ों के बैग में से नए कपड़े निकाल कर पहन लिए और एक दूसरे से चिपक कर सो गए.

इसके बाद क्या हुआ, वो अगले भाग में पेश करूँगा. आपके मेल का इन्तजार रहेगा.
kumarkiran15081993@gmail.com
कहानी जारी है.

हवसनामा: मेरी चुदती बहन-1

‘हवसनामा’ के अंतर्गत आज की यह कहानी एक ऐसे युवक फैजान से सम्बंधित है जो उन हालात का सामना करता है जिनसे वह राजी तो नहीं लेकिन जिन्हें बदल पाना उसके बस का नहीं था तो उन्हें चुपचाप स्वीकार कर लेने के सिवा और कोई चारा भी नहीं था। चलिये कहानी की शुरुआत फैजान के ही शब्दों से करते हैं।

दोस्तो, मेरा नाम फैजान है और मैं बिहार के एक शहर का रहने वाला हूँ। गोपनीयता के चलते अपने शहर का नाम नहीं बता सकता लेकिन बस इतना समझ लीजिये कि यह शहर गुंडागर्दी और अराजकता के लिये बदनाम है।

यह बात साल भर पहले की है जब हम अपने पुराने मुहल्ले को छोड़ कर नये मुहल्ले में शिफ्ट हुए थे। मेरे परिवार में अम्मी अब्बू और एक बड़ी बहन रुबीना ही थी जिसकी उम्र इक्कीस साल रही होगी तब और वह ग्रेजुएशन कर रही थी। जबकि मैं उससे दो साल छोटा था और मैंने इंटर के बाद बी.ए. के लिये प्राईवेट का फार्म भर के काम से लग गया था।

दरअसल हमारा मुख्य घर शहर से तीस किलोमीटर गांव में था लेकिन अब्बू की टेलरिंग की दुकान शहर में थी तो हम किराये के मकान में यहीं रहते थे। इसी सिलसिले में हमें पिछला मकान खाली करना पड़ा था और नये मुहल्ले में शिफ्ट होना पड़ा था।

यूँ तो हम चार भाई बहन थे लेकिन बीमारी के चलते दो भाइयों की मौत छोटे पर ही हो गयी थी और हम दो भाई बहन ही बड़े हो पाये थे। माँ बाप दोनों चाहते थे कि हम कम से कम ग्रेजुएशन की पढ़ाई तो कर लें लेकिन मेरा खुद का पढ़ाई में कोई खास दिल नहीं लगता था तो इंटर के बाद प्राइवेट ही ऐसे कालेज से बी.ए. का फार्म भर दिया था जहां नकल से पास होने की पूरी गारंटी थी और खुद अब्बू की दुकान जाने लगा था कि उन्हें थोड़ा सहारा हो जाये।

जबकि बहन रेगुलर शहर के इकलौते प्रतिष्ठित कालेज से पढ़ाई कर रही थी. यहां जब मैं यह कहानी इस मंच पर बता रहा हूँ तो मुझे यह भी बताना पड़ेगा कि वह लंबे कद की काफी गोरी चिट्टी और खूबसूरत थी, जिसके लिये मैंने अक्सर लड़कों के मुंह से ‘क्या माल है’ जैसे कमेंट सुने थे, जिन्हें सुन कर गुस्सा तो बहुत आता था लेकिन मैं अपनी लिमिट जानता था तो चाह कर भी कुछ नहीं कह पाता था।

शक्ल सूरत से मैं भी अच्छा खासा ही था लेकिन कोई हीरो जैसी न पर्सनालिटी थी और न ही हिम्मत कि गुंडे मवालियों से भिड़ जाऊं. फिर मेरी दोस्ती यारी भी अपने जैसे दब्बू लड़कों से ही थी।

कुछ दिन उस मुहल्ले में गुजरे तो वहां के दबंग लड़कों के बारे में तो पूरी जानकारी हो गयी थी और खास कर राकेश नाम के लड़के के बारे में, जो उनका सरगना था। उनमें से ज्यादातर हत्यारोपी थे और जमानत पर बाहर थे लेकिन उनकी गुंडागर्दी या दबदबे में कमी आई हो, ऐसा कहीं से नहीं लगता था। उनमें से ज्यादातर और खास कर राकेश को राजनैतिक संरक्षण भी हासिल था, जिससे उसके खिलाफ पुलिस भी जल्दी कोई एक्शन नहीं लेती थी।

और रहा मैं … तो मेरी तो हिम्मत भी नहीं पड़ती थी कि जहां वह खड़ा हो, वहां मैं रुकूं… जबकि वह कुछ दिन में मुझे पहचानने और मेरे नाम से बुलाने लगा था। परचून की दुकान पे खड़ा होता तो जबरदस्ती कुछ न कुछ ले के खिला ही देता था। थोड़ी न नुकुर तो मैं करता था लेकिन पूरी तरह मना करने की हिम्मत तो खैर मुझमें नहीं ही थी।

उसकी इस कृपा का असली कारण तो मुझे बाद में समझ में आया था कि वह बहुत बड़ा चोदू था और उसकी नजर मेरी बहन पर थी। उसकी क्या मुहल्ले के जितने दबंग थे, उन सबकी नजर उस पर थी और शायद राकेश का ही डर रहा हो कि वे एकदम खुल के ट्राई नहीं कर पाते थे।

मेरे पिछले मुहल्ले का माहौल ऐसा नहीं था तो यहां सब थोड़ा अजीब लगता था और गुस्सा भी आता था। कई बार जब आते जाते लड़कों को मेरी बहन को इशारे करते या फब्तियां कसते देखता तो आग तो बहुत लगती थी लेकिन फिर इस ख्याल से चुप रह जाता था कि वहां तो बात-बात पे छुरी कट्टे निकल आते थे तो ठीक भी नहीं था मेरा बोलना।

रुबीना के लिये यहां जिंदगी बड़ी मुश्किल थी क्योंकि उसे कालेज के बाद कोचिंग के लिये भी जाना होता था जहां से शाम को वापसी होती थी और गर्मियों में तो फिर उजाला होता था वापसी में तो चल जाता था लेकिन जब दिन छोटे होने हुए शुरू हुए तो जल्दी ही अंधेरा हो जाता था जिससे उसे वापसी में बड़ी दिक्कत होती थी।

इस बारे में उसने तो मुझे बाद में बताया था लेकिन कहानी के हिसाब से मेरा यहां बताना जरूरी है कि गर्मियों के दिनों में तो फिकरे ही कसते थे लोग लेकिन जब से वापसी में अंधेरा होना शुरू हुआ तब से उसका फायदा उठाते वे लफंगे गली में उसे न सिर्फ इधर उधर टच करते थे, दूध दबाते थे बल्कि कई बार तो तीन चार लड़के पकड़ कर, दीवार से टिका कर बुरी तरह मसल डालते थे।

ऐसे ही एक दिन शाम को वापसी में मैंने इत्तेफाक से यह नजारा देख लिया था. मेरा घर एक लंबी बंद गली के अंत में था और गली के मुहाने पर यूँ तो एक इलेक्ट्रिक पोल था जो रोशनी के लिये काफी था लेकिन शाम को उस टाईम तो अक्सर कटौती की वजह से लाईट रहती ही नहीं थी।

तो उस टाईम मैं भी इत्तेफाक से घर की तरफ आ रहा था और शायद थोड़ा पहले ही रुबीना भी गली में घुसी होगी। अंधेरा जरूर था मगर इतना भी नहीं कि कुछ दिखाई न और लाईट हस्बे मामूल गायब थी। तो गली में घुसते ही मुझे वह तीन लड़के किसी को दीवार से सटाये रगड़ते दिखे जो मेरी आहट सुन के थमक गये थे।

फिर शायद उन्होंने मुझे पहचान लिया और वे उसे छोड़ के मेरे पास से गुजरते चले गये। मैं आगे बढ़ा तो समझ में आया कि वह रुबीना थी, उसने भी मुझे पहचान लिया था और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गयी थी। हम आगे पीछे कर में दाखिल हुए थे और वह चुपचाप अपने कमरे में बंद हो गयी थी।

मैं उसकी मनःस्थिति समझ सकता था, इसलिये कुछ कहना पूछना मुनासिब नहीं समझा।

अगले दिन दोपहर में जब हम घर पे अकेले थे तब मैंने उससे पूछा कि क्या प्राब्लम थी तो पहले तो वह कुछ बोलने से झिझकी। जाहिर है कि हम भाई बहन थे और हममें इस तरह की बातें पहले कभी नहीं हुई थी… लेकिन फिर उसने बता दिया कि उसके साथ क्या-क्या होता था और वह अब सोच रही थी कि कोचिंग छोड़ ही दे।

तो मैंने उसे भरोसा दिलाया- अभी रुक जाओ, मैं देखता हूँ कुछ।
मैंने सोचा था कि राकेश से कहता हूँ… वह बाकी लौंडों को तो संभाल ही लेगा और जाहिर है कि खुद अपने जुगाड़ से लग जायेगा. लेकिन मुझे अपनी बहन पर यकीन था कि वह उसके हाथ नहीं आने वाली और इसी बीच उसका ग्रेजुएशन कंपलीट हो जायेगा।

मैंने ऐसा ही किया. अगले दिन मौका पाते ही राकेश को पकड़ लिया और दीनहीन बन कर उससे फरियाद की, कि वह मुहल्ले के लड़कों को रोके जो मेरी बहन को छेड़ते हैं। उसकी तो जैसे बांछें खिल गयीं। ऐसा लगा जैसे वह चाहता था कि मैं उससे ऐसा कुछ कहूँ। उसने मुझे भरोसा दिलाया कि मेरी बहन अब उसकी जिम्मेदारी… बस एक बार मैं उससे मिलवा दूं और बता दूं कि राकेश अब उसकी हिफाजत करेगा और फिर किसकी मजाल कि कोई उसे छेड़े।

मुझे उस पर पूरा यकीन नहीं था लेकिन फिर भी मैंने डरते-डरते रुबीना को राकेश से यह कहते मिलवा दिया कि वह मुहल्ले का दादा है और अब वह किसी को तुम्हें छेड़ने नहीं देगा।

इसके दो दिन बाद मैंने अकेले में रुबीना से पूछा कि अब क्या हाल है तो उसने बताया कि अब लड़के देखते तो हैं लेकिन बोलते नहीं कुछ और कोचिंग से वापसी में राकेश उसे खुद से पिक कर के दरवाजे तक छोड़ने आता है। मैं मन ही मन गालियां दे कर रह गया. समझ सकता था कि राकेश अपने मवाली साथियों को रुबीना के विषय में क्या समझाया होगा।

बहरहाल, इस स्थिति को स्वीकार करने के सिवा हमारे पास चारा भी क्या था। कम से कम इस बहाने वह मवालियों से सुरक्षित तो थी।
धीरे-धीरे ऐसे ही कई दिन निकल गये।

फिर एक दिन इत्तेफाक से मैं उसी टाईम वापस लौट रहा था जब वह वापस लौटती थी। वह शायद आधी गली पार कर चुकी थी जब मैं गली में दाखिल हुआ। लाईट हस्बे मामूल गुल थी और नीम अंधेरा छाया हुआ था। इतना तो मैं फिर भी देख सकता था उसके साथ चलता साया, जो पक्का राकेश ही था.. उसके गले में बांह डाले था और दूसरे हाथ से कुहनी मोड़े कुछ कर रहा था। पक्का तो नहीं कह सकता पर अंदाजा था कि वह उसके दूध दबा रहा था।

मेरे एकदम से आग लग गयी और मैं उसे आवाज देने को हुआ पर यह महसूस करके मेरी आवाज गले में ही बैठ गयी कि उसकी हरकत से शायद रुबीना को कोई एतराज ही नहीं था, क्योंकि न उसके कदम थमे थे और न ही वह अवरोध करती लग रही थी।

मुझे सख्त हैरानी हुई। दरवाजे पर पहुंच कर शायद दोनों ने कुछ रगड़ा रगड़ी की थी जो अंधेरे में मैं ठीक से समझ न सका और फिर वह अंदर घुस गयी और राकेश वापस मुड़ लिया।

मेरे पास पहुंचते ही उसने मुझे पहचान लिया और एक पल को सकपकाया तो जरूर लेकिन फौरन चेहरे पर बेशर्मी भरी मुस्कान आ गयी- घर तक छोड़ के आया हूँ बे, अब कोई नहीं छेड़ता। डोंट वरी… एश कर।
वह मेरे कंधे पर हाथ मारता हुआ गुजर गया और मुझसे कुछ बोलते न बना।

घर पहुंच कर मेरा रुबीना से सामना हुआ तो मेरा दिल तो किया कि उससे पूछूं लेकिन हिम्मत न पड़ी और बात आई गयी हो गयी।

अगले हफ्ते रात के करीब दस बजे मैं वापस लौट रहा था कि राकेश ने मेरी गली के पास ही मुझे रोक लिया। जनवरी का महीना था.. लाईट तो आ रही थी पर हर तरफ सन्नाटा हो चुका था। वे एक खाली खोखे में बैठे थे जो था तो धोबी का लेकिन अभी वहां अकेला राकेश ही था और उसका एक चेला, जिसने मुझे रोका था।

“अंदर चल।” चेले ने मुझे कंधे पर दबाव डाल कर खोखे के अंदर ठेलते हुए कहा और बाहर खुद खड़ा हो गया।
खोखा सामने से तो बंद था तो सामने से कुछ दिखना नहीं था और साइड से जो अंदर घुसने का रास्ता था, वहां चेला खड़ा था। अंदर जिस टेबल पर धोबी प्रेस करता था, उस पर दारू की एक आधी खाली बोतल और दो गिलास रखे थे और साथ ही रखा था एक देसी कट्टा, जो शायद मुझे डराने के लिये था।

ठंड में भी मेरे पसीने छूट गये।
“क्या बात है दद्दा?” मैंने डरते-डरते पूछा।
“आज मूड हो रहा है बे… इस टाईम कोई लौंडिया तो मिलेगी नहीं। तू ही सही। यह देख।” उसकी आवाज और चढ़ी हुई आंखें बता रही थीं कि वह नशे में था। मुझे उससे डर लगने लगा था।

जबकि उसने अपनी पैंट सामने से खोल कर अंडरवियर समेत नीचे कर दी थी जिससे उसका अर्ध उत्तेजित लिंग एकदम मेरे सामने आ गया था। उसके निगाहों से घुड़कने पर मैंने उसके लिंग की ओर देखा… अभी पूरी तरह खड़ा भी नहीं था तब भी सात इंच से लंबा ही लग रहा था और मोटा भी काफी थे। टोपे पर से आगे की चमड़ी अभी पूरी तरह हटी नहीं थी।

कहानी जारी रहेगी.